प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक और भारत की हरित क्रांति के जनक के रूप में प्रख्यात एम.एस.स्वामीनाथन का आज चेन्नई में उनके निवास पर निधन हो गया। वे 98 वर्ष के थे। स्वामीनाथन ने अपनी नीतियों के जरिये सामाजिक क्रांति लाकर 1960 के दशक में भारत को अकाल जैसी स्थिति से बचाया। उन्होंने एम.एस.स्वामीनाथन अनुसंधान प्रतिष्ठान की स्थापना की और उच्च उत्पादकता वाले गेहूं के बीज विकसित किये जिनसे भारत में हरित क्रांति आयी। वे 1972 से 1980 के बीच भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक और 1982 से 1988 के बीच अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संगठन के महानिदेशक रहे।
कृषि नीतियों के मोर्चे पर उल्लेखनीय कार्य करने वाले स्वामीनाथन को कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1986 में उन्हें अल्बर्ट आइंस्टीन विश्व विज्ञान पुरस्कार, 1991 में टाइटलर पर्यावरण उपलब्धि पुरस्कार और 2000 में अंतर्राष्ट्रीय भूगोल संघ का पदक प्रदान किया गया। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया।
राष्ट्रपति दौपदी मुर्मू ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। अपने संदेश में राष्ट्रपति ने कहा है कि डॉ स्वामीनाथन ऐसे दूर दृष्टा थे जिन्होंने खादय सुरक्षा का लक्ष्य हासिल करने के लिए अथक परिश्रम किया इसीलिए उन्हें हरित क्रांति का जनक कहा जाता है। उन्होंने कहा कि डॉ स्वामीनाथन ने कृषि विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण अनुसंधान किया, जिसके लिए उन्हें पद्म विभूषण से लेकर प्रतिष्ठित वर्ल्ड फूड प्राईज जैसे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति ने कहा कि डॉ स्वामीनाथन अपने पीछे भारतीय कृषि विज्ञान की समृद्ध विरासत छोड गये है, जिससे मानवता के लिए सुरक्षित और भूख मुक्त भविष्य का मार्ग प्रशस्त होता है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भारत की हरित क्रांति के जनक के रूप में प्रसिद्ध डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन के निधन पर दुख व्यक्त किया है। अपने संदेश में, श्री मोदी ने कहा कि उनके कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान ने देश के लाखों लोगों के जीवन को बदल दिया और देश के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की।